महाभारत 13.92.8
पितर ऊचुःनिवापान्नेन भगवन्भृशं पीड्यामहे वयम्प्रसादं कुरु नो देव श्रेयो नः संविधीयताम्
pitara ūcuḥnivāpānnena bhagavanbhṛśaṃ pīḍyāmahe vayamprasādaṃ kuru no deva śreyo naḥ saṃvidhīyatām
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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