महाभारत 13.94.7
अथाभवदनावृष्टिर्महती कुरुनन्दनकृच्छ्रप्राणोऽभवद्यत्र लोकोऽयं वै क्षुधान्वितः
athābhavadanāvṛṣṭirmahatī kurunandanakṛcchraprāṇo'bhavadyatra loko'yaṃ vai kṣudhānvitaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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