महाभारत 13.95.20
एका तिष्ठसि का नु त्वं कस्यार्थे किं प्रयोजनम्पद्मिनीतीरमाश्रित्य ब्रूहि त्वं किं चिकीर्षसि
ekā tiṣṭhasi kā nu tvaṃ kasyārthe kiṃ prayojanampadminītīramāśritya brūhi tvaṃ kiṃ cikīrṣasi
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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