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महाभारत 13.96.21
धुन्धुमार उवाच · dhundhumāra uvāca
अकृतज्ञोऽस्तु मित्राणां शूद्रायां तु प्रजायतुएकः संपन्नमश्नातु यस्ते हरति पुष्करम्
akṛtajño'stu mitrāṇāṃ śūdrāyāṃ tu prajāyatuekaḥ saṃpannamaśnātu yaste harati puṣkaram
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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