महाभारत 13.96.28
नहुष उवाच · nahuṣa uvāca
अतिथिं गृहस्थो नुदतु कामवृत्तोऽस्तु दीक्षितःविद्यां प्रयच्छतु भृतो यस्ते हरति पुष्करम्
atithiṃ gṛhastho nudatu kāmavṛtto'stu dīkṣitaḥvidyāṃ prayacchatu bhṛto yaste harati puṣkaram
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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