महाभारत 13.96.53
न तमापत्स्पृशेत्काचिन्न ज्वरो न रुजश्च हविरजाः श्रेयसा युक्तः प्रेत्य स्वर्गमवाप्नुयात्
na tamāpatspṛśetkācinna jvaro na rujaśca havirajāḥ śreyasā yuktaḥ pretya svargamavāpnuyāt
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें