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महाभारत 13.96.9
तानाह सर्वानृषिमुख्यानगस्त्यः; केनादत्तं पुष्करं मे सुजातम्युष्माञ्शङ्के दीयतां पुष्करं मे; न वै भवन्तो हर्तुमर्हन्ति पद्मम्
tānāha sarvānṛṣimukhyānagastyaḥ; kenādattaṃ puṣkaraṃ me sujātamyuṣmāñśaṅke dīyatāṃ puṣkaraṃ me; na vai bhavanto hartumarhanti padmam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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