महाभारत 14.2.3
यजस्व विविधैर्यज्ञैर्बहुभिः स्वाप्तदक्षिणैःदेवांस्तर्पय सोमेन स्वधया च पितॄनपि
yajasva vividhairyajñairbahubhiḥ svāptadakṣiṇaiḥdevāṃstarpaya somena svadhayā ca pitṝnapi
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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