महाभारत 14.21.16
घोषिणी जातनिर्घोषा नित्यमेव प्रवर्ततेतयोरपि च घोषिण्योर्निर्घोषैव गरीयसी
ghoṣiṇī jātanirghoṣā nityameva pravartatetayorapi ca ghoṣiṇyornirghoṣaiva garīyasī
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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