महाभारत 14.23.24
परस्परस्य सुहृदो भावयन्तः परस्परम्स्वस्ति व्रजत भद्रं वो धारयध्वं परस्परम्
parasparasya suhṛdo bhāvayantaḥ parasparamsvasti vrajata bhadraṃ vo dhārayadhvaṃ parasparam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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