महाभारत 14.37.7
परिचर्या च शुश्रूषा सेवा तृष्णा व्यपाश्रयःव्यूहोऽनयः प्रमादश्च परितापः परिग्रहः
paricaryā ca śuśrūṣā sevā tṛṣṇā vyapāśrayaḥvyūho'nayaḥ pramādaśca paritāpaḥ parigrahaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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