महाभारत 14.38.5निर्ममो निरहंकारो निराशीः सर्वतः समःअकामहत इत्येष सतां धर्मः सनातनःnirmamo nirahaṃkāro nirāśīḥ sarvataḥ samaḥakāmahata ityeṣa satāṃ dharmaḥ sanātanaḥइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें