महाभारत 14.46.32
ग्रामैकरात्रिको ग्रीष्मे वर्षास्वेकत्र वा वसेत्अध्वा सूर्येण निर्दिष्टः कीटवच्च चरेन्महीम्
grāmaikarātriko grīṣme varṣāsvekatra vā vasetadhvā sūryeṇa nirdiṣṭaḥ kīṭavacca carenmahīm
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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