महाभारत 14.46.55
निर्मुक्तः सर्वसङ्गेभ्यो वायुराकाशगो यथाक्षीणकोशो निरातङ्कः प्राप्नोति परमं पदम्
nirmuktaḥ sarvasaṅgebhyo vāyurākāśago yathākṣīṇakośo nirātaṅkaḥ prāpnoti paramaṃ padam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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