महाभारत 14.49.30
नावं न शक्यमारुह्य स्थले विपरिवर्तितुम्तथैव रथमारुह्य नाप्सु चर्या विधीयते
nāvaṃ na śakyamāruhya sthale viparivartitumtathaiva rathamāruhya nāpsu caryā vidhīyate
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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