महाभारत 14.49.53
इष्टोऽनिष्टश्च शब्दस्तु संहतः प्रविभागवान्एवं बहुविधो ज्ञेयः शब्द आकाशसंभवः
iṣṭo'niṣṭaśca śabdastu saṃhataḥ pravibhāgavānevaṃ bahuvidho jñeyaḥ śabda ākāśasaṃbhavaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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