महाभारत 14.57.55
एवं महात्मना तेन त्रीँल्लोकाञ्जनमेजयपरिक्रम्याहृते दिव्ये ततस्ते मणिकुण्डले
evaṃ mahātmanā tena trīm̐llokāñjanamejayaparikramyāhṛte divye tataste maṇikuṇḍale
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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