महाभारत 14.57.5
सौदास उवाच · saudāsa uvāca
प्रजा निसर्गाद्विप्रान्वै क्षत्रियाः पूजयन्ति हविप्रेभ्यश्चापि बहवो दोषाः प्रादुर्भवन्ति नः
prajā nisargādviprānvai kṣatriyāḥ pūjayanti haviprebhyaścāpi bahavo doṣāḥ prādurbhavanti naḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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