महाभारत 14.6.22
नारद उवाच · nārada uvāca
उन्मत्तवेषं बिभ्रत्स चङ्क्रमीति यथासुखम्वाराणसीं तु नगरीमभीक्ष्णमुपसेवते
unmattaveṣaṃ bibhratsa caṅkramīti yathāsukhamvārāṇasīṃ tu nagarīmabhīkṣṇamupasevate
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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