महाभारत 14.6.9
न त्वां याजयितास्म्यद्य वृणु त्वं यमिहेच्छसिउपाध्यायं महाबाहो यस्ते यज्ञं करिष्यति
na tvāṃ yājayitāsmyadya vṛṇu tvaṃ yamihecchasiupādhyāyaṃ mahābāho yaste yajñaṃ kariṣyati
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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