महाभारत 14.61.2
तथैव वासुदेवोऽपि स्वस्रीयस्य महात्मनःदयितस्य पितुर्नित्यमकरोदौर्ध्वदेहिकम्
tathaiva vāsudevo'pi svasrīyasya mahātmanaḥdayitasya piturnityamakarodaurdhvadehikam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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