महाभारत 14.65.21
अभिमन्योश्च भद्रं ते प्रियस्य सदृशस्य चप्रियमुत्पादयाद्य त्वं प्रेतस्यापि जनार्दन
abhimanyośca bhadraṃ te priyasya sadṛśasya capriyamutpādayādya tvaṃ pretasyāpi janārdana
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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