महाभारत 14.65.8वसत्सु वृष्णिवीरेषु तत्राथ जनमेजयजज्ञे तव पिता राजन्परिक्षित्परवीरहाvasatsu vṛṣṇivīreṣu tatrātha janamejayajajñe tava pitā rājanparikṣitparavīrahāइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें