महाभारत 14.72.8
विक्षिपन्गाण्डिवं राजन्बद्धगोधाङ्गुलित्रवान्तमश्वं पृथिवीपाल मुदा युक्तः ससार ह
vikṣipangāṇḍivaṃ rājanbaddhagodhāṅgulitravāntamaśvaṃ pṛthivīpāla mudā yuktaḥ sasāra ha
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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