महाभारत 14.76.22
तस्मिन्मोहमनुप्राप्ते शरजालं महत्तरम्सैन्धवा मुमुचुस्तूर्णं गतसत्त्वे महारथे
tasminmohamanuprāpte śarajālaṃ mahattaramsaindhavā mumucustūrṇaṃ gatasattve mahārathe
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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