महाभारत 14.76.7
ते किरन्तः शरांस्तीक्ष्णान्वारणेन्द्रनिवारणान्रणे जयमभीप्सन्तः कौन्तेयं पर्यवारयन्
te kirantaḥ śarāṃstīkṣṇānvāraṇendranivāraṇānraṇe jayamabhīpsantaḥ kaunteyaṃ paryavārayan
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें