महाभारत 14.78.2
मणिपूरेश्वरं त्वेवमुपयातं धनंजयःनाभ्यनन्दत मेधावी क्षत्रधर्ममनुस्मरन्
maṇipūreśvaraṃ tvevamupayātaṃ dhanaṃjayaḥnābhyanandata medhāvī kṣatradharmamanusmaran
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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