Loading
महाभारत 14.78.5
धिक्त्वामस्तु सुदुर्बुद्धिं क्षत्रधर्माविशारदम्यो मां युद्धाय संप्राप्तं साम्नैवाथो त्वमग्रहीः
dhiktvāmastu sudurbuddhiṃ kṣatradharmāviśāradamyo māṃ yuddhāya saṃprāptaṃ sāmnaivātho tvamagrahīḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें