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महाभारत 14.80.19
न हि मे पितरं हत्वा निष्कृतिर्विद्यते क्वचित्नरकं प्रतिपत्स्यामि ध्रुवं गुरुवधार्दितः
na hi me pitaraṃ hatvā niṣkṛtirvidyate kvacitnarakaṃ pratipatsyāmi dhruvaṃ guruvadhārditaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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