महाभारत 14.80.22
इत्येवमुक्त्वा नृपते धनंजयसुतो नृपःउपस्पृश्याभवत्तूष्णीं प्रायोपेतो महामतिः
ityevamuktvā nṛpate dhanaṃjayasuto nṛpaḥupaspṛśyābhavattūṣṇīṃ prāyopeto mahāmatiḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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