महाभारत 14.82.3
कच्चित्ते पृथुलश्रोणि नाप्रियं शुभदर्शनेअकार्षमहमज्ञानादयं वा बभ्रुवाहनः
kaccitte pṛthulaśroṇi nāpriyaṃ śubhadarśaneakārṣamahamajñānādayaṃ vā babhruvāhanaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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