महाभारत 14.84.5
तत्र पूजां यथान्यायं प्रतिगृह्य स पाण्डवःपुनरावृत्य कौन्तेयो दशार्णानगमत्तदा
tatra pūjāṃ yathānyāyaṃ pratigṛhya sa pāṇḍavaḥpunarāvṛtya kaunteyo daśārṇānagamattadā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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