महाभारत 14.84.7तं चापि वशमानीय किरीटी पुरुषर्षभःनिषादराज्ञो विषयमेकलव्यस्य जग्मिवान्taṃ cāpi vaśamānīya kirīṭī puruṣarṣabhaḥniṣādarājño viṣayamekalavyasya jagmivānइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें