महाभारत 14.84.9ततस्तमपि कौन्तेयः समरेष्वपराजितःजिगाय समरे वीरो यज्ञविघ्नार्थमुद्यतम्tatastamapi kaunteyaḥ samareṣvaparājitaḥjigāya samare vīro yajñavighnārthamudyatamइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें