महाभारत 14.85.11
तस्य पार्थः शिरस्त्राणमर्धचन्द्रेण पत्रिणाअपाहरदसंभ्रान्तो जयद्रथशिरो यथा
tasya pārthaḥ śirastrāṇamardhacandreṇa patriṇāapāharadasaṃbhrānto jayadrathaśiro yathā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें