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महाभारत 14.91.12
वनं प्रवेक्ष्ये विप्रेन्द्रा विभजध्वं महीमिमाम्चतुर्धा पृथिवीं कृत्वा चातुर्होत्रप्रमाणतः
vanaṃ pravekṣye viprendrā vibhajadhvaṃ mahīmimāmcaturdhā pṛthivīṃ kṛtvā cāturhotrapramāṇataḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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