महाभारत 14.91.37
सर्पिःपङ्का ह्रदा यत्र बहवश्चान्नपर्वताःरसालाकर्दमाः कुल्या बभूवुर्भरतर्षभ
sarpiḥpaṅkā hradā yatra bahavaścānnaparvatāḥrasālākardamāḥ kulyā babhūvurbharatarṣabha
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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