महाभारत 14.93.22
अनुकम्पितो नरो नार्या पुष्टो रक्षित एव चप्रपतेद्यशसो दीप्तान्न च लोकानवाप्नुयात्
anukampito naro nāryā puṣṭo rakṣita eva caprapatedyaśaso dīptānna ca lokānavāpnuyāt
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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