महाभारत 14.93.82
इत्युक्तवाक्यो धर्मेण यानमारुह्य स द्विजःसभार्यः ससुतश्चापि सस्नुषश्च दिवं ययौ
ityuktavākyo dharmeṇa yānamāruhya sa dvijaḥsabhāryaḥ sasutaścāpi sasnuṣaśca divaṃ yayau
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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