महाभारत 15.10.15
देशान्तरस्थाश्च नरा विक्रान्ताः सर्वकर्मसुमात्राभिरनुरूपाभिरनुग्राह्या हितास्त्वया
deśāntarasthāśca narā vikrāntāḥ sarvakarmasumātrābhiranurūpābhiranugrāhyā hitāstvayā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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