महाभारत 15.22.28
प्रसीद मातर्मा गास्त्वं वनमद्य यशस्विनिश्रियं यौधिष्ठिरीं तावद्भुङ्क्ष्व पार्थबलार्जिताम्
prasīda mātarmā gāstvaṃ vanamadya yaśasviniśriyaṃ yaudhiṣṭhirīṃ tāvadbhuṅkṣva pārthabalārjitām
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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