महाभारत 15.25.7
राज्ञस्तु याजकैस्तत्र कृतो वेदीपरिस्तरःजुहाव तत्र वह्निं स नृपतिः सत्यसंगरः
rājñastu yājakaistatra kṛto vedīparistaraḥjuhāva tatra vahniṃ sa nṛpatiḥ satyasaṃgaraḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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