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महाभारत 15.27.4
सर्ववृत्तान्ततत्त्वज्ञो भवान्दिव्येन चक्षुषायुक्तः पश्यसि देवर्षे गतीर्वै विविधा नृणाम्
sarvavṛttāntatattvajño bhavāndivyena cakṣuṣāyuktaḥ paśyasi devarṣe gatīrvai vividhā nṛṇām
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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