महाभारत 15.42.15
परापरज्ञस्तु नरो नाभिमानादुदीरितःअपरज्ञः परां बुद्धिं स्पृष्ट्वा मोहाद्विमुच्यते
parāparajñastu naro nābhimānādudīritaḥaparajñaḥ parāṃ buddhiṃ spṛṣṭvā mohādvimucyate
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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