महाभारत 16.4.28
तथान्यानपि निघ्नन्तं युयुधानं समन्ततःअभ्यधावद्धृषीकेशो विनिवारयिषुस्तदा
tathānyānapi nighnantaṃ yuyudhānaṃ samantataḥabhyadhāvaddhṛṣīkeśo vinivārayiṣustadā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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