महाभारत 16.8.52ततोऽर्जुनो धनुर्दिव्यं गाण्डीवमजरं महत्आरोपयितुमारेभे यत्नादिव कथंचनtato'rjuno dhanurdivyaṃ gāṇḍīvamajaraṃ mahatāropayitumārebhe yatnādiva kathaṃcanaइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें