महाभारत 16.8.53
चकार सज्यं कृच्छ्रेण संभ्रमे तुमुले सतिचिन्तयामास चास्त्राणि न च सस्मार तान्यपि
cakāra sajyaṃ kṛcchreṇa saṃbhrame tumule saticintayāmāsa cāstrāṇi na ca sasmāra tānyapi
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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