महाभारत 16.8.56
कलत्रस्य बहुत्वात्तु संपतत्सु ततस्ततःप्रयत्नमकरोत्पार्थो जनस्य परिरक्षणे
kalatrasya bahutvāttu saṃpatatsu tatastataḥprayatnamakarotpārtho janasya parirakṣaṇe
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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