महाभारत 16.9.6
न त्वा प्रत्यभिजानामि किमिदं भरतर्षभश्रोतव्यं चेन्मया पार्थ क्षिप्रमाख्यातुमर्हसि
na tvā pratyabhijānāmi kimidaṃ bharatarṣabhaśrotavyaṃ cenmayā pārtha kṣipramākhyātumarhasi
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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