महाभारत 17.1.1
जनमेजय उवाच · janamejaya uvāca
एवं वृष्ण्यन्धककुले श्रुत्वा मौसलमाहवम्पाण्डवाः किमकुर्वन्त तथा कृष्णे दिवं गते
evaṃ vṛṣṇyandhakakule śrutvā mausalamāhavampāṇḍavāḥ kimakurvanta tathā kṛṣṇe divaṃ gate
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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